Friday 5 July 2013

दर्शकों दिल लूट लेगा यह 'लुटेरा' और उसकी लुटेरी


1907 में अमेरिकी कहानीकार ओ हेनरी की लघु कथा द लास्ट लीफ़ प्रकाशित हुई थी। ग्रीनविच गाँव की पृष्ठभूमि पर यह कहानी निमोनिया से पीड़ित एक युवती की थी। वह खिड़की से बाहर अंगूर की बेल की पत्तियां झड़ती देखती रहती है। वह सोचती है कि जब इस अंगूर की आखिरी पत्ती गिर जाएगी तब वह भी मर जाएगी.। उसके घर के नीचे एक हताश चित्रकार भी रहता है, जो चाहता है एक मास्टरपीस पेंटिंग बनाना, जिसे सब सराहें। उसे जब युवती की सोच के बारे में पता चलता है तो वह उससे कहता है कि वह ऐसा न सोचे। पत्ती कभी नहीं गिरेगी। एक दिन तूफानी रात में आखिरी पत्ती भी झाड जाती है। आर्टिस्ट को पता चलता है तो वह बेल पर एक पत्ती की पेंटिंग बना कर लगा देता है। समय के साथ वह लड़की दवा लेकर ठीक हो जाती है। उधर आर्टिस्ट को निमोनिया हो जाता है। उसे अस्पताल ले जाया जाता है, पर वह बच नहीं पाता।
ओ हेनरी की यह कहानी जीने की आशा से लबरेज संदेश देने वाली थी। उड़ान से मशहूर विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म लुटेरा देखते हुए आप रोमैन्स से लिपटी इस जीवन की आशा की खुशबू को महसूस करते हैं। वरुण श्रीवास्तव प्राचीन मूर्तियों के लुटेरों के गिरोह का सदस्य है। वह एक जमींदार के मंदिर से प्राचीन मूर्ति चुराने विभाग के कर्मचारी की रूप मे आता है। जमींदार की लड़की पाखी उसे देख कर पहली नज़र  में उससे प्यार करने लगती है। धीरे धीरे वरुण भी पाखी के प्यार में पड़ जाता है। मगर अपने चाचा की खातिर उसे ऐन मंगनी के वक़्त मूर्ति चुरा कर भागना पड़ता है। जमींदार को दिल का दौरा पड़ता और वह मर जाता है। एक साल बाद वरुण और पाखी डलहौजी में अजीब परिस्थिति में फिर मिलते हैं। पाखी को टीबी है। वह मरने के करीब है, जबकि वरुण को पुलिस से भागते समय गोली लगी हुई है। इसी अनोखे मिलन से द लास्ट लीफ़ का प्रवेश होता है। पाखी को लगता है कि जब उस के घर के सामने लगे पेड़ की आखिरी पत्ती गिर जाएगी तो वह भी मर जाएगी।

विक्रमादित्य ने लुटेरा की कहानी भवानी अइयर के साथ लिखी है। फिल्म की स्क्रिप्ट कुछ इस प्रकार लिखी गयी है कि हर रील के साथ दर्शकों में उत्सुकता बढ़ती जाती है, सस्पेन्स गहराता जाता है, इसके बावजूद रोमैन्स की खुशबू महसूस होती रहती है। फिल्म 1953 के कलकत्ता पर है। विक्रमादित्य ने कहानी की प्राचीनता को बनाए रखने के बावजूद वरुण और पाखी की जोड़ी के रोमैन्स की रुचिकर लहर बनाए रखी है। यह फिल्म मसाला थ्रिलर हो सकती थी, लेकिन मोटवाने ने इसे बैलेन्स रखते हुए रोमांटिक थ्रिलर बनाए रखा है। इसके बावजूद कि वरुण और पाखी के बीच गहरे रोमांटिक क्षण आते हैं, लेकिन दर्शक बिना किसी चुंबन या गरमा गरम आह ऊह की आवाज़ों के रोमैन्स को महसूस करता है। यह विक्रमादित्य, भवानी अय्यर की कथा पटकथा के अलावा अनुराग कश्यप के संवादों का असर था। फिल्म में अमित त्रिवेदी का संगीत रोमैन्स को महसूस कराता है। हल्की धुनों के बावजूद दर्शक ऊबता नहीं। अन्यथा आज का दर्शक तो तेज़ धुनों का आदि हो गया है। महेंद्र शेट्टी का केमरा डलहौजी की खूबसूरती को पाखी की खूबसूरती से कुछ इस प्रकार मिलाता है कि दर्शक मुग्ध हो जाता है। उन्होने डलहौजी की गलियों में एक्शन को बेहतर ढंग से फिल्माया है। फिल्म की संपादक दीपिका कैरा से ज़्यादा मेहनत की अपेक्षा थी। उन्हे फिल्म को थोड़ा छोटा करना चाहिए था। सुबरना रॉय चौधरी ने बंगाली वेश भूषा में प्राचीन गहने और वस्त्रों को शामिल कर फिल्म को वास्तविकता देने की भरपूर कोशिश की है। Kazvin दंगोर और धारा जैन की सेट डिज़ाइनिंग माहौल के अनुकूल है।

अब आते है अभिनय पर। सोनाक्षी सिन्हा को अभी तक दर्शकों ने सलमान खान, अक्षय कुमार और अजय देवगन जैसे एक्शन अभिनेताओं के साथ शोख अदाएं बिखेरते देखा था। इन आधा दर्जन फिल्मों में सोनाक्षी सजावटी गुड़िया से अधिक नहीं थी। लेकिन, लुटेरा की पाखी के रूप में वह जितनी सुंदर दिखती हैं, उससे कहीं आधिक प्रभावशाली और दिल को छू लेने वाला अभिनय करती हैं। पाखी के वरुण बने रणवीर सिंह को प्यार भरी निगाह से देखती सोनाक्षी की हिरणी जैसी जैसी आँखें दर्शकों के दिलों में धंस जाती हैं। बीमार पाखी के दर्द और असहायता को सोनाक्षी ने बेहद मार्मिक ढंग से अपनी आँखों और चेहरे के भावों से प्रस्तुत किया है। इस फिल्म के बाद सोनाक्षी का अपनी समकालीन अभिनेत्रियों को काफी पीछे छोड़ देना तय है। उनका पूरा पूरा साथ देते हैं वरुण श्रीवास्तव बने रणवीर सिंह। अभी तक रणवीर सिंह ने खिलंदड़े रोल ही किए हैं। इस फिल्म में वह अपने मूर्तियों के चोर और पाखी के प्रेम में पड़े , उसकी पीड़ा से छटपटते प्रेमी को बेहद स्वाभाविक तरीके से प्रस्तुत किया है। उन्होने साबित कर दिया है कि उनमे अभिनय की क्षमता है, बशर्ते की डाइरेक्टर भी सक्षम हो। अन्य भूमिकाओं में विक्रांत मैसी, आरिफ ज़ाकरिया, अदिल हुसैन, शिरीन गुहा और प्रिंस हैदर मुख्य पत्रों को सपोर्ट करते हैं।
लुटेरा की शुरुआत धीमी गति से होती हैं। खास तौर पर फ़र्स्ट हाफ थोड़ा धीमा है, पर यह कहानी बिल्ड करता है, इधर उधर भटकता नहीं। रोमैन्स के फूल खिलने लगते हैं। दूसरे हाफ में रणवीर के फिर प्रवेश के बाद फिल्म में थ्रिल पैदा होता है, जो ऐसा अमर प्रेम पैदा करता है, जिसकी कल्पना हिन्दी दर्शकों ने की नहीं होगी।
लुटेरा को देखा जाना चाहिए अपनी साफ सुथरी कहानी, माहौल, रोमैन्स तथा सोनाक्षी सिन्हा और रणवीर सिंह के बेहतरीन अभिनय के लिए। जो दर्शक अच्छी फिल्मों की चाहत रखते हो वह निश्चित तौर पर निराश नहीं होंगे।


Thursday 4 July 2013

क्या पुलिस की गिरफ्त में आएगा या पुलिस को भी लूट लेगा लुटेरा!


कल दो फिल्में रिलीज हो रही हैं। एकता कपूर, शोभा कपूर, अनुराग कश्यप और विकास बहल के पिटारे से निकली है विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म  लुटेरा । इस साल जिस प्रकार से एक के बाद एक फिल्मे सौ करोडिया क्लब मे शामिल होती जा रही हैं, उससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि थोड़ा स्लो स्टार्ट के बावजूद लुटेरा पिक करेगी और सौ करोड़ क्लब में शामिल हो जाएगी। यह सच हो सकता था अगर लुटेरा का मुकाबला पुलिसगिरि  से  न हो रहा होता। पुलिसगिरि निर्माता Rahul अग्रवाल और टीपी अग्रवाल की फिल्म है। इसका निर्देशन दक्षिण के केएस रविकुमार कर रहे हैं। फिल्म के संजय दत्त हैं। यह वही संजय दत्त हैं जो अभी जेल गए है तथा कथित सहानुभूति लहर उनके साथ है। संजय दत्त की स्टार पावर के कारण लुटेरा का पुलिसगिरि की हवा निकालना आसान नहीं होगा, लेकिन कठिन कतई नहीं।
सवाल यहा यह है कि दर्शक पुलिसगिरि या लुटेरा को देखे ही क्यों?  संजय दत्त अब चुक चुके अभिनेता हैं। प्राची देसाई, हालांकि फिल्म का सक्रिय प्रचार कर रही हैं। लेकिन, उनमे इतनी दम नहीं कि  वह दर्शकों को सिनेमाहाल तो क्या पत्रकारों को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तक ले आ पाएँ । इसलिए अब फिल्म के प्रचार में संजय दत्त की गांधीगिरी के चर्चे हो रहे हैं। उनकी फिल्म को संजय दत्त के जेल के साथी कैदियों को विशेष स्क्रीनिंग में दिखलाया जाएगा। पर ऐसा संभव होगा? पुलिसगिरि की कहानी सत्तर के दशक की ज़ंजीर के जमाने की है। एक ईमानदार कॉप का तबादला एक बदनाम थाने में जाता हैं, जहां दबंगों का बोलबाला है। ऐसे दबंगों को संजय दत्त कैसे खत्म कराते हैं, यही फिल्म की घिसिपीटी कहानी है। इस फिल्म को पहले संजय दत्त की 1990 में रिलीज फिल्म थानेदार के सेकुएल के रूप में किया जा रहा था। फिल्म का नाम थानेदार 2 रखा जाना था। लेकिन, संजय दत्त को यह टाइटल पसंद नहीं आया। नतीजे के तौर पर उन्हीं के सुझाव पर थानेदार 2 को पुलिसगिरि कर दिया गया। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पुलिसगिरि बॉक्स ऑफिस पर क्या गुल खिलाएगी।
 
पुलिसगिरि के ऑपोज़िट लुटेरा है। इस फिल्म की कहानी साथ साल पहले के कलकत्ता की है। एक जमींदार के पास एक युवक पुरातत्ववेत्ता का पत्र लेकर आता है, जिसमे उस लड़के को मदद देने का अनुरोध किया गया है। जमींदार लड़के को अपने घर रख लेता है तथा खोज में उसकी मदद करता है। इसी बीच लड़का और लड़की यानि रणवीर कपूर और सोनाक्षी सिन्हा के बीच प्यार पननपने लगता है। दोनों के विवाह की तारीख तय होती ही है कि एक दिन लड़का पुरातत्व के महत्व की एक कीमती चीज़ चुरा कर भाग जाता है। इससे जमींदार का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो जाता है। इसके काफी समय बाद लड़का एक बार फिर उसके घर रहस्यमयी स्थितियों में पहुँच जाता है। फिर क्या होता है?
संजय दत्त और प्राची देसाई के मुकाबले रणवीर और सोनाक्षी की जोड़ी अपने समय की बेहद गरम जोड़ी  है। हालांकि, रणवीर का संजय दत्त से कोई मुकाबला नहीं, पर सोनाक्षी सिन्हा बेजोड़ हैं। वह एक के बाद एक हिट फिल्में दे रही हैं। रणवीर की भी पहले की दो फिल्में बैंड बाजा बारात और  लेडिज वरसेस रिकी बहल सफल रही थीं। इस लिहाज से मधुर संगीत, फिल्म के माहौल और विक्रमादित्य मोटवाने के निर्देशन के कारण लुटेरा पुलिसगिरि को पछड़ सकती है।
क्या लुटेरा पुलिस को लूट ले जाएगा? क्या पुलिसगिरि लुटेरा को अपनी गिरफ्त में ले पाएगी? कहा जा रहा है कि संजय दत्त के जेल जाने के बाद उनके पक्ष में दर्शकों के बीच सहानुभूति की लहर है। यह लहर उनकी फिल्म के बॉक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ बहा ले आएगी। कल इसी लहर की परीक्षा भी है।  क्या होगा यह कल पता लगेगा। लेकिन इतना तय है कि सिंगल स्क्रीन थिएटर में पुलिसगिरि की पुलिसगिरि ही चलेगी। लुटेरा मल्टीप्लेक्स में बढ़िया प्रदर्शन करेगी। हो सकता है कि माउथ पब्लिसिटी के बाद लुटेरा सिंगल स्क्रीन दर्शकों का दिल भी जीत ले। लेकिन, क्या ऐसा संभव है कि संजय दत्त अपनी पुलिसगिरि से सिंगल स्क्रीन दर्शकों को इतना आकर्षित करे कि वह मल्टीप्लेक्स के सहारे आसमान छू रही फिल्म लुटेरा को पछाड़ सके। क्या ऐसा होगा?  

Wednesday 3 July 2013

इमरान हाशमी के पैरों में क्लार्क गेबल और आमिर खान के जूते !

बाईस साल पहले हॉलीवुड फिल्मों के चोर महेश भट्ट ने एक फिल्म दिल है कि मानता नहीं बनाई थी। इस फिल्म में उनकी बेटी पूजा भट्ट चाकलेटी अभिनेता आमिर खान की नायिका थी। दिल है कि मानता नहीं अस्सी साल पहले रिलीज हॉलीवुड की फिल्म इट हैप्पेंड वन नाइट की कार्बन कॉपी थी। वैसे इसी फिल्म पर निर्माता निर्देशक और अभिनेता राजकपूर ने नर्गिस को लेकर 1956 में रिलीज फिल्म चोरी चोरी का निर्माण किया था। दोनों ही हिन्दी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही थीं।
अब यानि दिल है कि मानता नहीं की रिलीज के 22 साल बाद महेश भट्ट ने इट हैप्पेंड वन नाइट के रीमेक चोरी चोरी और चोरी चोरी के रीमेक दिल है कि मानता नहीं का फिर से रीमेक करने का फैसला किया है। वैसे महेश भट्ट को अभी यह तय करना है कि घर से भागी एक अमीर बाप की बिगड़ैल लड़की की कहानी को जस का तास रखा जाए या उसमे कुछ फेर बदल किया जाए। होगा क्या यह बाद में मालूम पड़ेगा। फिलहाल इतना मालूम पड़ चुका  है हॉलीवुड के क्लार्क गेबल और आंकिर खान के जूतों में पैर बॉलीवुड के आरिजिनल सिरियल किसर इमरान हाशमी डालेंगे। महेश भट्ट अपनी फिल्म और अपने भांजे को सुपर डुपर हिट बनाना चाहते हैं। क्या वह ऐसा कर पाएंगे? लेकिन, महेश भट्ट के ऐसा कहने से कि इट हैप्पेंड वन नाइट में जो किरदार क्लार्क गेबल और एमी ने निभाया था वह कुछ जांच नहीं पाया था। हम दिखाएँगे कि लड़की लड़के को दिल ही दिल में नहीं प्यार करती बल्कि, वह लड़के के प्यार में पूरी तरह से डूबी हुई है। इसका साफ मतलब यह है कि बॉलीवुड के आधुनिक क्लार्क गेबल इमरान हाशमी अपने प्यार में डूबी हुई लड़की के कितने गहरे और ज़्यादा चुंबन लेते है और अपने बिस्तर पर ले जाते हैं।

फरहान और रेबेका के इंटिमेट दृश्य हटाये गए


भाग मिल्खा भाग की कहानी भारत के मशहूर धावक मिल्खा सिंह पर है। इस फिल्म में मिल्खा सिंह के ज़िन्दगी के कई पहलू को सामने लाया जायेगा। राकेश ओमप्रकाश मेहरा जो कि फिल्म के निर्देशक हैं उनका कहना है कि ये फिल्म सिर्फ मिल्खा के खेल करियर पर ही आधारित नहीं किया गया है बल्कि उनके जीवन में बीते अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे चीज़ों का ज़िक्र किया गया है। 
हाल ही में आये भाग मिल्खा भाग के ट्रेलर में फरहान अख्तर और रेबेका के बीच किसिंग सीन को देखकर दर्शक काफी आश्चर्य चकित रह गए थे लेकिन दर्शकों को इस बात की खबर नहीं कि ट्रेलर में सिर्फ एक छोटी सी किसिंग सीन दिखाई गयी है जबकि फिल्म में उनके बीच अच्छा ख़ासा इंटिमेट सीन है। लेकिन फिल्म के मेकर्स ने ये तय किया कि फिल्म से कुछ दृश्य हटा देने चाहिए। हालाकि उनका मानना है कि ये सभी दृश्य फिल्म के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं पर वो नहीं चाहते थे कि इनकी वजह से फिल्म के मायने बदल जायें। 
फरहान जो कि मिल्खा का किरदार निभा रहे हैं वो रेबेका से ऑस्ट्रेलिया में ऑलंपिक के दौरान मिलते हैं और दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगते हैं। फिल्म के सूत्रों के हिसाब से इन दोनों की प्रेम कहानी को फिल्म में बड़े ही दिलचस्प तरीके से फिल्माया गया है। 
भाग मिल्खा भाग 5 जुलाई को रिलीज़ होने वाली है।  

आज रिलीज होगा सत्या 2 का फ़र्स्ट लूक

पंद्रह साल पहले आज ही के दिन 3 जुलाई को निर्देशक रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या रिलीज हुई थी। इस फिल्म ने मनोज बाजपई, उर्मिला मतोंदकर, जेडी चक्रवर्ती, शेफाली शाह, सौरभ शुक्ल, आदि के कैरियर को नयी दिशा दी थी। सौरभ शुक्ल ने इस गंगस्टेर फिल्म से अपनी कलम की ताक़त का प्रदर्शन किया था। भिखू म्हात्रे और कल्लू मामा के चरित्र cult कैरक्टर बन गए। रामगोपाल वर्मा की फिल्म मात्र दो करोड़ के बजेट से बनाई गयी थी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर साढ़े पंद्रह करोड़ का बिज़नस किया था। सत्या के बाद रामगोपाल वर्मा ने दो अन्य गंगस्टेर फिल्में कंपनी और डी बनायीं। इन फिल्मों को गंगस्टेर त्रिलोजी कहा जाता है।
आज रामगोपाल वर्मा अपनी फिल्म सत्या 2 का फ़र्स्ट लुक रेलीज़  कर रहे हैं। इस फिल्म को उनकी 15 साल पहले की फिल्म सत्या का सेकुएल कहा जा रहा है। वर्मा ने इस फिल्म को इसी टाइटल के साथ तेलुगू में भी शूट किया है। सत्या की तरह सत्या 2 में भी नयी स्टार कास्ट है। अब देखने की बात यह होगी कि क्या सत्या की सत्या 2 भी हिट साबित होगी? क्या सत्या की नयी स्टार कास्ट की तरह सत्या 2 के नए चेहरे भी हिन्दी दर्शकों के जाने पहचाने चेहरे बन जाएंगे?


छोटी फिल्में... बड़ा धमाका

छोटी फिल्में आजकल बड़ी फिल्मों के मुकाबले ज्यादा आगे हैं। देखा जाये तो ये एक नया ट्रेंड बन चूका है। छोटी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाल दिखा रही हैं। अगर 2013 के 6 महीनों की बात करें तो इस बीच कई कम बजट वाली फिल्में आयीं जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद से दुगना कमाया। इस सूची में कई फिल्में शामिल हैं जैसे- फुकरे, आशिकी, मेरे डैड की मारुति, कमांडो, एबीसीडी, काई पो चे, गो गोवा गोन आदि।  
हाल फिलहाल की फिल्में देखें तो फुकरे ने एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया है कि एक छोटी फिल्म किस स्तर पर पहुँच सकती है। फुकरे एक छोटी बजट वाली फिल्म होने के साथ साथ नए कलाकारों को लेकर बनाई गयी फिल्म है। यहाँ तक की फिल्म के निर्देशक भी सिर्फ एक फिल्म पुराने हैं बॉलीवुड में। उस हिसाब से देखा जाये तो फिल्म ने ज़ोरदार धमाका मचाया है। बॉलीवुड में जहाँ सिर्फ बड़े बजट या बड़े सितारों की फिल्में चलने का चलन है वहां फुकरे जैसी फिल्म ने ये साबित कर दिया है कि अगर फिल्म की कहानी अच्छी हो और उसका सही तरीके से निर्देशन किया जाये तो दर्शकों को वो ज़रूर लुभाती हैं। फिल्म में भले ही सारे नए चहरे थे लेकिन उन सब ने अपने किरदारों को बहतरीन तरीके से निभाया। वहीँ निर्देशक मृगदीप सिंह लाम्बा ने भी अपने प्रतिभा को साबित किया। 
आशिकी 2 की बात करें तो इस फिल्म में भी 2 नए चहरे आदित्य रॉय कपूर और श्रद्धा कपूर ने काम किया है। फिल्म का निर्देशन मोहित सूरी ने किया है। इस फिल्म ने अपनी उम्मीदों और बजट के भी हिसाब से कई गुना ज्यादा बिजनेस किया। फिल्म ने धीरे धीरे सभी दर्शकों का दिल जीत लिया और फिल्म ने करोडों का आंकड़ा पार कर लिया। 
वहीँ यशराज की भी छोटे बजट वाली फिल्म मेरे डैड की मारुति में सारे नए कलाकार ही थे। फिल्म का निर्देशन आशिमा छिब्बर ने किया था जिनकी ये पहली फिल्म थी। इस फिल्म को भी बॉक्स ऑफिस पर अच्छा रिस्पोन्स मिला।
विपुल शाह की फिल्म कमांडो ने भी नए चहरों के साथ कुछ कम असर नहीं छोड़ा दर्शकों पर। ये एक ऐक्शन फिल्म थी जिसका निर्देशन दिलीप घोष ने किया था।
आने वाली फिल्मों में माना जा रहा है कि आनंद गांधी की शिप ऑफ़ थिसियस और नीरज पाण्डेय की अमन की आशा बॉक्स ऑफिस पर बड़ी छाप छोड़ेंगी।     

Tuesday 2 July 2013

घनचक्कर को बॉक्स ऑफिस पर आया चक्कर


घनचक्कर को बॉक्स ऑफिस पर चक्कर आना ही था। दिलचस्प बात यह थी कि विद्या बालन और इमरान  हाशमी  स्टारर इस फिल्म को बढ़िया वीकेंड भी नहीं मिला। इस फिल्म ने वीकेंड में 6.38, 6.45 और 7.15 के बिज़नस के साथ 19.98 करोड़ का बिज़नस किया। साफ तौर पर विद्या-इमरान जोड़ी द डर्टी पिक्चर वाला जादू नहीं जगा सकी। इससे एक बात और साफ हुई कि अगर फिल्म में एंटर्टेंमेंट एंटर्टेंमेंट और एंटर्टेंमेंट नहीं होगा, कोई विद्या बॉक्स ऑफिस को नहीं पढ़ा सकेगी। विद्या बालन और इमरान हाशमी की जोड़ी वाली यह फिल्म इन दोनों के बीच की ठंडक का शिकार हो गयी। विद्या बालन बेहद नॉन-स्टार्टर लग रही थीं। इमरान हाशमी जब तक स्मूचिंग नहीं करेंगे और अपनी हीरोइन को बिस्तर तक नहीं ले जाएंगे, दर्शकों उन्हे स्वीकार करने नहीं जा रहा। इससे पहले शंघाई भी उनकी अपनी सिरियल किसर इमेज तोड़ने के प्रयास का शिकार हो गयी थी । इमरान हाशमी को यह समझ लेना चाहिए कि आप बिना अभिनय के इमेज थाम कर ही सफल हो सकते हैं। हालांकि, इस फिल्म में इमरान की भूमिका काफी सशक्त और केन्द्रीय थी।
दूसरी ओर पहले सप्ताह में 34.98 करोड़ कमाने वाली दक्षिण के सुपर स्टार धनुष की फिल्म राँझना ने दूसरे वीकेंड में 10.75 करोड़ का बिज़नस किया और इस प्रकार कुल दस दिनों में 45 करोड़ से ऊपर का बिज़नस कर पाने में सफल हुई।